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तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद सबसे बड़ा सबक किसके लिए है? – अमेरिका, चीन, रूस, पाकिस्तान?

नहीं – सबसे बड़ा सबक उनके लिए है जो राष्ट्र प्रेम और देशभक्ति को सिरे से खारिज करने में लगे हुए, हैं नई-नई परिभाषाएँ गढ़ कर – सोशल मीडिया और चाय की चुस्कियों पर गढ़ी गईं ये अति-बुद्धिजीवी परिभाषाएँ तब धराशायी हो जाती हैं जब देश प्रेम के अभाव में साढ़े तीन लाख की आधुनिक हथियारों से सजी फौज, मैदान छोड़ कर भाग जाती है, राष्ट्र को हाशिये पर धकेलने की कोशिशों का अंजाम तब पता चलता है जब देश का राष्ट्रपति ही बजाय अंतिम साँस तक लड़ने के सूटकेस में पैसे भरकर भाग खड़ा होता है। जब जनता लुटने और पिटने को असहाय छोड़ दी जाती है….

ह्रदय नहीं वो पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं….

और हाँ ये राष्ट्रप्रेम बाहर से किसी इंजेक्शन के जरिए नहीं लगाया जा सकता, अमेरिका 20 साल तक कोशिश करने के बाद भी यह नहीं कर पाया। ये अंदर से पनपना चाहिए, और उसे पनपने दीजिए। अगर अफगान सेना और वहाँ के लड़ाके इस राष्ट्रप्रेम से भरे होते तो लड़ते-लड़ते मर जाते पर मैदान नहीं छोड़ते।

इसी राष्ट्र प्रेम को परवान चढ़ा कर नेताजी ने आजाद हिन्द फौज खड़ी की थी, भगत सिंह फाँसी के फंदे पर झूल गए, खुदीराम बोस ने प्राणों का उत्सर्ग किया, तिलक ने अपना जन्मसिद्ध अधिकार माँगा, उधम सिंह ने बंदूक उठाई और लक्ष्मी बाई ने तलवार चलाई।

इसी राष्ट्रप्रेम के बसंती चोले को पहन कर कोई विक्रम बत्रा ‘ये दिल मांगे मोर’ कहते हुए कारगिल की बर्फीली चोटियों पर तिरंगा लहराते हुए माँ भारती के चरणों में अपने प्राण समर्पित कर देता है, इसी देश प्रेम की हुंकार भरते हुए कोई विंग कमांडर अभिनंदन दुश्मन की सरहद में सीना तान कर घुस जाता है, कोई कैप्टन सौरभ कालिया अपनी जान दे देता है, कोई मेजर शैतान सिंह अपने चंद सैनिकों के साथ दुश्मन के हजारों सैनिकों से भिड़ जाता है, कोई स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा बन कर दुश्मन की धरती पर उतर जाता है तो कोई मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी पीठ दिखा कर भागने की बजाय लोंगेवाला की पोस्ट पर जान की बाजी लगा कर भिड़ा रहता है।

दुनिया के मंच पर अपना राष्ट्र गान सुनने की खातिर कोई अभिनव बिंद्रा सुनहरा निशाना लगाता है तो कोई नीरज चोपड़ा अपने भाले को आसमान की बुलंदियों तक फेंक देता है।

रोम कूपों में सिहरन पैदा कर देने वाले इस जज़्बे से ही राष्ट्र बनता है।

जो लोग अति बौद्धिकता की आड़ लेकर राष्ट्र और उससे जुड़ी परिभाषाओं को खारिज करने में लगे हैं वो सब – कोउ हो नृप हमें का हानि – वाले लोग हैं – इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता की देश कौन चला रहा है – इन्हें बस पैसे कमाने हैं और परिवार चलाना है। मुसीबत आएगी तो ये अपनी पहचान, अपना धर्म सब बदलने के लिए तैयार हो जाएँगे, उससे भी बात नहीं बनेगी तो अपना पासपोर्ट बदल लेंगे और पहली फ्लाइट से देश छोड़ कर भाग जाएँगे।

इनके चक्कर में मत पड़िए – ये देश के लिए तब भी नहीं लड़े थे – आगे भी नहीं लड़ेंगे।

राष्ट्रीय चरित्र का अभाव ही किसी भी देश के पतन के लिए जिम्मेदार है।

इसीलिए इस पर लगातार प्रहार किए जाते हैं।

आज हवाई जहाज के टायर से चिपक कर मर जाने की कीमत पर भी लोग अफगानिस्तान छोड़ के भाग जाना चाहते हैं। तालिबान की दहशत का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा?

हमें राष्ट्रप्रेम के नए प्रतीक भी गढ़ने होंगे – केवल सरहद पर जान देना ही राष्ट्रभक्ति नहीं है – वो सर्वोच्च बलिदान है – पर जो जहाँ है वहाँ से भी मुल्क को मजबूत करे – राष्ट्रप्रेम के इस यज्ञ में आहूति दे – योगदान दे।

पूरी दुनिया को तालिबान बना देने को आतुर कुटिल मंसूबों को पहचानिए। अपने अंदर राष्ट्रप्रेम की लौ को प्रज्ज्वलित रखिए – सबसे ऊपर। तभी हम पूरे स्वाभिमान से जी पाएंगे और ‘आज़ादी’ का सही मतलब समझ पाएँगे – जो हमारे लिए लड़ रहे हैं और जान देने के लिए तैयार हैं – उन्हें ये भरोसा हमेशा होना चाहिए कि वो गद्दारों के लिए नहीं लड़ रहे, जिस तिरंगे की शान उनके लिए सर्वोपरि है वो तिरंगा पूरे देश के मन- मस्तिष्क में भी उसी शान से फहरा रहा है – राष्ट्रप्रेम की प्रचंड ज्वाला पूरे देश में मौजूद है और मौका पड़ने पर दुश्मन की गोलियाँ ही कम पड़ेंगी – सीने नहीं !!

आज पूरा देश पूरे लाम पर है,

जो जहाँ पर है वतन के काम पर है..

#जयहिंद #वन्देमातरम

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